??? ????? ????? ?? ??? ?? .?????? ???? ?????,???? ?? ?????? ????? ?? ????? ??? .???? ??? ????? ?????...
Expand
खूब निखरा निखरा सा दिन था .चमकदार नीला आसमान,सूरज की सुनहली रौशनी मे नहाया हुआ .कहीं कही इक्का दुक्का सफ़ेद छौने से बादल नीले आकाश मे अधखुली पलको के सपने से टिके हुए थे .इतराती हवा मे बसंत का नशा था.उसने बालकनी की रेलिंग पर अपनी दोनो कोहनियां टिकयी और आंखो को आकाश के विस्तार मे खुला छोड़ दिया .धत ,यह तीसरी मंजिल के फ़्लैट से आसमान कितनी दूर लगता है .उसका मन किया बिना रुके एक सांस मे सारी सीढियां चढ कर छत पर पहुंच जाये .छत से आसमान कितना अपना लगता है .पंजो के बल उचक कर खड़े हो और हाथ ऊपर कर बाहों मे भर लो आसमान .नहीं नही वहां हवा भी इतनी तेज लगती है कि बस बाहे फ़ैलाओ और तिरते रहो नीले अनंत विस्तार मे .अरे फ़िर बहकने लगीवह .उसने अपने उड़ते हुए विचरों को पकड़ा और पल्लू के साथ अपने चारों ओर लपेट लिया .विस्तार आकाश का हो ,समुद्र का या फ़िर हरियाली का ,उसे ऐसे ही बहा ले जाता है अपने साथ .और फ़िर बस वह होति है और उसके आस पास रचा बसा उसकी कल्पना का तिल्स्म .
उसने अपनी द्रिष्टी को आकाश से समेटा और नीचे पार्क की हरियाली पर छॊड़ दिया .तीसरी मंजिल का यह फ़ायदा तो है कि पार्क का कुछ हिससा उसे बिल्कुल साफ़ दिखायी देता है और जो दूर है वह धुंधला ही सही पर हरा तो दिखायी पड़ता है .जाते हुए जाड़े की नरम धूप हरी ,मुलायम घास को अपने गुनगुने स्पर्श से सहला रही थी.पेड़ो के पत्ते हवा की ताल पर धीरे धीरे थिरक रहे थे .दोपहर का अलस सन्नाटा चारों ओर फ़ैला हुआ था.इस समय पार्क अक्सर खाली ही रहता है .जगह जगह लाल नीले पीले उन्नाबी फ़ूल झूम झूम कर बसं त की अगवानी कर रहे थे .उसका मन करता है कि नीचे जा कर नंगे पैर घास पर खूब थिरके और इतनी जोर से हसें की पार्क का सन्नाटा एक मीठी झन्कार से टूट जाये .
ऐसी ही नाजाने कितनी भोली भाली नाजुक चाहते उसके मन मे कैद हैं .बारिश की पहली बूंदो को चेहरे पर सीधे मह्सूस करना ,पूरे चांद की रात किसी पहाड़ी पर बैठ सारी सारी रात चांदनी मे डूबे रहना ,डूबते सूरज के रंगो मे नहाये आसमान को साड़ी बना अपने बदन पर लपेट लेना .लेकिन उसे पता है कि ये दुनिया उसके अंदर ही रची बसी है और ऐसी ही रहेगी .कोई नही आयेगा जो उसकी इस सपनीली दुनिया मे सच्चाई का एक भी स्ट्रोक मार दे .
नही ऐसा नही है कि वह खूबसूरत नही है .ऐसा भी नही है कि हाथ पैर सलामत नही है .बोल क्या वह तो गा भी बहुत सुरीला लेती है .उम्र भी अभी हाथ से नही निकल गयी .फ़िर भला कोई साथ देने वाला क्यो नही मिल सकता .
वह सोचना ही नहीं चाहती उस दिन ,उस घटना के बारे मे .साधारण सी ही थी उसकी दुनिया .चार बहनो के बीच छोटॆ मोटे झगड़े,रूठना ,मनाना.काम मे व्यसत हसती मुस्कुराती मां और उसके पापा.पापा की सबसेे लाडली वही थी.उसके पापा हिन्दी साहित्य के प्रोफ़ेसर थे और उनकी रुचि विरासत मे उसने ही पायी थी .इसीलिये शायद उसका पापा के साथ एक अलग स्तर पर भी जुड़ाव था.उस रात भी वह और पापा एक काव्य गोष्ठी से लौटरहे थे .मां तो बहुत मना करती थी उसे ले जाने के लिये पर फ़िर उसकी लाड़ भरी जिद के आगे घुटने टेक देती थी .उस दिन गोष्ठी बहुत अच्छी रही थी .वह और पापा चर्चा मे व्यस्त चले आरहे थे आटो स्टैंड की तरफ़ .आगे पीछॆ वहां से निकले और लोग भी थे .अचानक पीछे से एक खुली जीप आयी.कुछ लड़के थे .शायद नशे मे थे .जोर जोर से गाते चिल्लाते .जब तक वह सम्झती ,हटती या और लोग सतर्क होते उनमे से एक उछल कर बाहर आया और उसे दबोच जीप के अंदर . उसकी घिघ्घीबंध गयी थी .वह चिल्ला भी नही पायी.फ़िर वह कमरा और उन चारो की ग्ड्डंमड्ड होती सूरते .लेकिन उसके जेहन मे अटकी रह गयी थी उसकी शकल जिसने उसे उठाया था .हलां कि उस कमरे मे उसने उसे हाथ भी नही लगाया था ऐसा उसे लगता है .बेहोश होने से पहले एक बार जब उसकी आंख छणांश को खुली थी तो दीवार से चिपके खड़े उसके चेहरे से जा टकरायी थी और फ़िर उसकी आंख खुली थी अस्प्ताल मे .
मां अंदर आयी थी पापा तो उसके पास ही नही आये थे .मां ने ही बताया था कि वे खुद को ही अपराधी ठहरा रहे थे अंदर ही अंदर .पर ये सब बातें तो बहुत बाद मे उठी थी उसके जेहन मे .ना जाने कितने दिन तो जैसे किसि अंधेरी सुरंग मे बीत गये .लोगो के बीच तो वह इतने साल बाद भी नही जाती है .आस पास कोई भी हो फ़िर वे चाहे बहने ही क्यो ना हो वह अपने अंदर सिमट जाती है .अरसा हो गये उसकी आवाज निकले .बस जब वह अकेलि होती है ,प्रक्रिति के साथ तो जैसे जिंदा हो उठती है .वो .उसके ख्याल और किताबे ...एक अलग संसार रच लिया है उसने अपने चारोंओर .उसे पता है बच्चो वाली किताबे पढते देख ,मां अंदर ही अदर रोती है .अक्सर उससे कहती भी है ....तुम तो मेरी सबसे होशियार बेटी हो .बड़े बड़े कागज दिखाती है ....यह देखो तुमाहरे सर्टिफ़िकेट ,तुम्हारी डिग्री .पता नही किस लड़की की बात करती है.उसे ऐसी कोई लडकी याद नही आती .अपनी सारी कोशिे नाकाम होती देख सबने उसे अब उसके हाल पर छोड दिया है और वह भी इस स्तिथी से खुश है .
आज सबेरे से मां बहुत व्यसत है .छोटी बहन को देखने आने वाले है .मां बिल्कुल नही चाहती थी कि वे लोग घर आये पर वे लोग किसी और काम से शहर मे आये थे इस्लिये उन्हे घर ही बुलाना शिष्टाचार का तकाजा था .बाकी दोनो बहनो की शादी तो मा ने कभी मामा कभी मौसी के शह्रो मे जा कर निप्टायी थी .सच तो यह है कि इस शहर मे कोई जानता भी नही है कि इस घर मे चौथी लड़की भी है .मां उस हादसे के बाद शायद इसीलिये इस बड़े शहर आ गयी थी .यहां वैसे भी किसी को किसी की जिंदगी मे झाकने का समय कहां है.
वह हमेशा की तरह अपने कमरे मे बंद थी .खिड़की की सलाखे पकड़े आकाश ताकती.लड़के की मां कह रही थी ,यह तो शादी करने को तैयार ही नही होता था .पता नही कैसे आपकी बेटी की फ़ोटॊ देख कर आने की हामी भर दी .बस मेरा बेटा हां कर दे ,हम तो तैयार ही है .मां सोच रही थी ,मेरी बेटी जैसी लड़कियां नहीं दिखायी होगी वरना फ़िर इसके लिये क्यो राजी हो जाता .वह एक दो शब्दो मे पूछी गयी बात का जवाब दे देता और फ़िर चुप बैठ जाता .लेकिन वह बहुत प्रयत्नो के बाव्जूद अपनी बेचैनी ,अपनी उद्विग्न्ता छुपा नही पा रहा था .मां को लग रहा था किसी के घर जा कर लड़की देखने मे अक्सर सम्वेदन्शील लड़के असहज अनुभव करने लगते है .
उसके कमरे की बाहर की ओर खुलने वाली खिड़की से बालकनी का एक छोटा सा कोना दिखता है .कौवो की करकश आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ और आस्मान मे चिपकी उसकी नज़र बाल्कनी की ओर मुड़ी .उसकी आंखे फ़टने लगी .कोने मे चिडिया का एक नाजुक सा बच्चा उपर किसी घोसले से आ गिरा था .उसके चारो ओर पांच छः कौवे मंडरा रहे थे ,जोर जोर से शोर मचाते .बच्चा बेचारा दुबक कर फ़र्श से चिपक जाने की कोशिश कर रहा था .अभी उसके पंख पूरी तरह खुले तो क्या उगे भी नहीं थे.खिड़की जाली पर उसकी उगलिओ का दबाव बढता जा रहा था .वह चिल्लाने की कोशिश कर रही थी पर आवाज कही गले के अंदर ही घुट कर रह जा रही थी.तभी एक कौवा दुःसाहस कर आगे बढाऔर चिड़िया के बच्चे के नाजुक सी काया पर अपनी चोंच मारी .उसकी देखा देखी दूसरा भी आगे बढा .उसकी उगंलियो से रक्त की पतली सी धार बही और पलके कस कर बंद हो गयी .दिल दहला देने वाले एक रुधी,घुटी चीख दूर तक फ़ैल गयी .
कमरे मे बैठे सारे लोग चौंक गये .मां कांप उठी .कमरे के दर्वाजे पर छोटी के हाथो मे चाय की ट्रे थर्थरा उठी .बिना आगा पीछा सोचे मां झटके से उठ उसके कमरे की ओर भागे किसी अन्होनी की आशंका मे डूबे मेह्मान भी उठ खड़े हुए लेकिन लड़का जैसे किसी अनजानी डोर से बंधा मां के पीछे पीछे कमरे तक चला गया ,पूरा घर फ़लागता .उसे रोके या कुछ कहे इतनी चेतना कोई बटोर ही नही पाया .वह अभी भी वैसे ही खिड़की से चिपकी थी ,मुंह से दबी दबी चीखे अभी भी निकल रही थी .मां अपनी पूरी कोशिश के बाव्जूद उसकी घयल उगलियो को खिड़की से अलग नही कर पा रही थी .लड़का मा की सहायता करने आगे बढा और उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही जड़ हो गया .उसके चेहरे के भाव इतने मुखर थे कि मां खॆऎ आंखो मे सैकड़ो सवाल एक साथ तैर गये .अपने को संयत कर लड़के ने उसकी उंगलियो पर अपने कंप्कंपा ते हाथ रखे और एक एक कर उसकी उंगलियो को जाली से अलग करने लगा .
उसकी मूर्छा मे जैसे सेंध लगी .खून से लत्पथ अपनी हथेलियो को उसने आश्चार्य से देखा फ़िर जैसे कमरे मे औरो की उपस्थिति के प्रति सजग हुई .उसकी नज़रे उठी और पास खड़े लडके के चेहरे पर ठहर गयी .उसकी द्रिष्टी मे कोई दबी सी चिन्गारी लहकी ,कोई भूली सी पह्चान जागी और वह अचानक हर्कत मे आ गयी .उसके मुंह से अस्फ़ुट शब्द गिरते जारहे थे और वह दोनो हाथो से लड़के की कमीज पकड़ उसे झिंझोड़ रही थी .सब बुत से खड़े थे .कोई कुछ नही समझ पा रहा था .लड्का चुप्चाप खड़ा उसका यह आक्रमण झेल रहा था .मां को ऐसा लग रहा था कि लड़्के के चहरे पर सूकून की छाया फ़ैलती जारही है.लड़के ने अपनी लटकी हुई बाहे उठायी और धीरे से उसे सहारा दे कुर्सी तक ले आया .उसे बैठा कर खुद वही जमीन पर उसके पैरो के पास बैठ गया .कमरे मे बाकी लोगो की उपस्थिति जैसे बेमानी थी .अब लड़का बोल रहा था साफ़ लफ़्जो और द्रिढ आवाज मे ......तुम्हारी ही तरह मै भी उस रात को कभी भूल नही पाया .मेरे हाथो बहुत बड़ा पाप हुआ है .जोश ,शर्त और पहले नशे के झोक मे मुझसे जो हो गया था वह कुछ इस तरह घटॆगा इसकी मैं कल्पना नही कर पाया था .सच मानो हमने कुछ प्लान नही किया था .सब कैसे घटता चला गया .मैने कितना ढूढने की को शिश भी की .तब्से आज तक एक भी रात ठीक से नही सोया हूं .मेरा पाप नासूर बन मेरे भीतर टीसता रहता है .प्लीज, तुम मुझे इससे मुक्त होने का रास्ता दिखाओ .मै..मै सब कुछ सहने ,सब कुछ करने को तैयार हूं .वह चुपचाप उसकी आंखो मे फ़ैले रेगिस्तन को देख रही थी .फ़िर वह धीरे से कुर्सी से उतर उसके पास बैठी और सीधे उसकी आंखो मे झांका .अचानक दोनो एक दूसरे से लिपटे और एक साथ बहते आंसुओ नेे एक नया भविष्य रचना शुरु कर दिया .अपने अपने आंसू पोछते सब धीरे धीरे कमरे से बाहर हो गये और आस्मान नीचे आ खिड़की से टिक कर खड़ा हो गया .
Close
wah bhai wah laajawab . Aapki lekhnee to kaafi shshkta hai. I enjoyed it to the fullest. God bless you.
Reply | | Report Abuse
shootradhar ji
kahani ke flow ...wali bat ne hame tasalli di kyon ki haath ke dard kee vajah se bahut tukado me likhi gayee thee kahanee .
key board par ungli rakhi thi prem kahani likhane ke liye par jab dard bahane laga to socha isme bhi kahi prem khoja jaye .
hame khushi hui ki aapko prayas achha laga
utsah vardhan aur kahani likhate samay sambhavit fall outs se aagaah karane ke liye aabhar
namita
Reply | | Report Abuse
hi ehsaas
tumhari bat pad kar man khushi se bhar aaya .jaise bahut dino se bichhude kisi apane se milane par hota hai na honth muskurate hai aur aankhe paniya jati hai .desh chhota hai par ham khushboo pahuchate rahane ki poori koshish karege .ham to lucknow chhod pune aane me hee dukhi hai .apanee jagah ka khichav aisa hi hota hai .
namita
Reply | | Report Abuse
dhanyawad yashji ....aise haadase hote hai aur jab bhee padho man dino tak takleef me bheega rahata hai .jeewan ke prati aastha rahe is irade se ant sukhad kiya hai
aapne dard ko tah tak mahsoos kiya ,shukriya.nari ke prati aapake vichar jan kar man ko bahut tassali milati hai
namita
Reply | | Report Abuse
Namita...
Aaj mujhe khushi hai ki jo maine pahle hi apane blog main declared kar diya tha ki Hindi Ki Ek Badi Kalam Aa chuki hai Sulekha Par ................wah aap ne sahi saabit kiya...Meri Nazar ki Sulekha ke doston ko taaref karni chayiye....!
Namita Katha-vastu...Asaadhaaran ya nayi na hone ke bawjood aap ne jis andaaz main shabdo ka tilism buna hai wah kabile taaref hai....Ghatana kram sahi ban pada hai...Prakariti ka vardan aur usko kahani ke saath jodna lajabaab rahaa....kabhi kabhi kyaa hota hai aap apni baat kahane ke pryaas main kahani ki rawangi bhool jaate hain ....Lekin aap ne kahani ke flow par asar nahi padne diya...iske liye aap badhai ki paatra hain...!
Apani kalam ko aur samay dene ki koshish kariye..!
Shubh-Kamanao sahit !
Shootradhaar !
Reply | | Report Abuse
Namita
humey shabd nahi mil rahey jissey hum apni bhaavuk stithi aur aapki bhasha ko sanmaan de sakey.. bachpan main jab hindi pariksha key liey padhtey they tab hindi bhasha sey itna lagaav tha .. din ba din aagey badhey apna desh chuta aur aaj itney saalon key baad aapki kahani padhkar humey woh ehsaas woh lagav waapis mila hain ..shukriya...
Reply | | Report Abuse
Man ko jhanjhorh ke rakh diya aap ki kahani ne....ek larhaki ke jeevanki sab se barhi punji lutane par us ke man ki kya dasha ahoti hai is ka chitran aap ne bahut hi khoobsurat dhang se kiya hai.....Aurat isi liye to mahan kahalti hai ki wo apneupar julam dhane wale ko bhi itani aasani se maaf kar deti hai...Dukhis baat ka hai mard log aurat kiisi khoobika galt istemaal karte hain.....Yash
Reply | | Report Abuse
thanks your appreciation matters a lot .u know i want to see goodness everywhere ....bitterness does not appeal me
namita
Reply | | Report Abuse
a very beautiful story....your narration is superb...i was so happy with the end....
Reply | | Report Abuse
Thanks Namita, chance ki baat hai , maine bhi ise se pahale aapki koi rachana nahi padhi , hindi ki rachana meri aankho se ojhal rahi, pata nahi yah kaise hua? aaj pahali baar hi maine padhi aapki koi rachana .aur yah bhi chance hi hai ki ham dono ne ikathe hi sulekha par entry maari hai .I have a very small baby( 2 yrs old) ise liye main jayaada samay nahi de paati hoo ,to bahut kuch choot jaata hai. aap se milkar achcha laga............seema
Reply | | Report Abuse
- 1
- 2
Displaying 1 - 10 of 12 Blog Comments